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दिसम्बर की निर्वाचित पुस्तक
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सप्ताह की पुस्तक
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कुँवर उदयभान चरित इन्शा अल्ला खां द्वारा रचित सामाजिक उपन्यास है जिसका प्रकाशन १९०५ ई॰ में लखनऊ के एंग्लो-ओरियंटल प्रैस द्वारा किया गया था।


"सिर झुकाकर नाक रगड़ता हूं उस अपने बनानेवाळे के साम्हने जिस ने हम सबको बनाया और बातकी बातमें वह सब कर दिखाया जिसका भेद किसीने न पाया। आतियां जातियां जो सांसें हैं। उसके बिन ध्यान सब यह फांसें हैं॥ यह कलका पुतला जो अपने उस खिलाड़ी की सुध रक्खे तो खटाईमें क्यों पड़े और कडुवा कसैला क्यों हो। उस फलकी मिठाई चक्खै जो बड़ोंसे बड़े अगलोंने चक्खी है। देखनेको आखैं दीं और सुन्नेको यह कान दिये नाक भी ऊंची सबमें करदी मूरतोंको जी दान दिये मिट्टीके बासनको इतनी सकत कहां जो अपने कुन्हारके करतब कुछ बतासके। सच है जो बनाया हुवा हो सो अपने बनानेवालेको क्या सराहे और क्या कहे यों जिसका जी चाहे पड़ा बके।..."(पूरा पढ़ें)


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धर्म के नाम पर आचार्य चतुरसेन शास्त्री द्वारा रचित पुस्तक है। इसका प्रकाशन इन्द्रप्रस्थ पुस्तक भण्डार, देहली द्वारा सम्वत् १९९० वि॰ में किया गया था।

"धर्म ने हज़ारों वर्ष से मनुष्य जाति को नाको चने चबाऐ हैं। करोड़ों नर नाहरों का गर्म रक्त इसने पिया है, हज़ारों कुल बालाओं को इसने जिन्दा भस्म किया है, असंख्य पुरुषों को इसने ज़िन्दा से मुर्दा बना दिया है। यह धर्म पृथ्वी की मानव जाति का नाश करेगा कि उद्धार—आज इस बात पर विचारने का समय आगया है।
धर्म के कारण ही धर्म के पुत्र युधिष्ठिर ने जुआ खेला, राज्य हारा, भाइयों और स्त्री को दाव पर लगा कर गुलाम बनाया, धर्म ही के कारण द्रौपदी को पांच आदमियों की पत्नी बनना पड़ा। धर्म ही के कारण अर्जुन और भीम के सामने द्रौपदी पर अत्याचार किये गये और वे योद्धा मुर्दे की भांति बैठे देखते रहे। धर्म ही के कारण भीष्मपितामह और गुरुद्रोण ने पांडवों के साथ कौरवों के पक्ष में युद्ध किया, धर्म ही के कारण अर्जुन ने भाइयों और सम्बन्धियों के खून से धरती को रङ्गा, धर्म ही के कारण भीष्म आजन्म कुंवारे रहे, धर्म ही के कारण कुरुओं की पत्नियो ने पति से भिन्न पुरुषों से सहवास करके सन्तान उत्पन्न कीं।"...(पूरा पढ़ें)


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  1. हिंदी रस गंगाधर.djvu ‎[४२८ पृष्ठ]
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रचनाकार
रचनाकार

अनुपम मिश्र
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अनुपम मिश्र (१९४८ - १९ दिसम्बर २०१६), लेखक, पत्रकार और पर्यावरणविद् थे। विकिस्रोत पर उपलब्ध उनकी रचनाएँ :
  1. राजस्थान की रजत बूँदें - १९९५
  2. आज भी खरे हैं तालाब - २००४
  3. साफ़ माथे का समाज - २००६


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आज का पाठ

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मोपला आन्दोलन स्वामी सहजानन्द सरस्वती द्वारा रचित किसान सभा के संस्मरण का एक अंश है जिसका प्रकाशन १९४७ ई॰ में किया गया।

"बात असल यह है कि मालाबार के जमींदार ब्राह्मण ही हैं। उत्तरी मालाबार में शायद ही दो एक मोपले भी जमींदार हैं। और ये मोपले-गरीब किसान हैं। इनमें खाते-पीते लोग शायद ही हैं। इन किसानों को जमीन पर पहले कोई हक था ही नहीं और झगड़े की असली बुनियाद यही थी, यही है। यह पुरानी चीज है और शोषक जमींदारों के हिन्दू (ब्राह्मण) होने के नाते ही इन संघर्षों पर धार्मिक रंग चढ़ता है। नहीं, नहीं, जान-बूझकर चढ़ाया जाता है। १८८० वाले विद्रोह में मोपलों ने दो जमींदारों पर धावा किया था।..."(पूरा पढ़ें)

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